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श्रीनगर की लाइफलाइन पर प्रहार: अवैध खनन से सूख रही अलकनंदा, ग्रामीण परेशान।

उत्तराखंड की गौरवशाली अलकनंदा नदी आज अपने सबसे भीषण संकट से गुजर रही है। कभी अपनी अविरल और निर्मल जलधारा के लिए विख्यात यह नदी अब अवैध खनन के माफियाओं के चंगुल में है। श्रीनगर गढ़वाल क्षेत्र में दिन-रात चल रही जेसीबी मशीनों और भारी ट्रकों ने नदी के सीने को छलनी कर दिया है। हालात इतने भयावह हैं कि अलकनंदा अब नदी नहीं, बल्कि रेत और पत्थरों का एक विशाल सूखा मैदान नजर आने लगी है।

दिन-रात खुदाई से खोखली हो रही जलधारा

स्थानीय निवासियों का दर्द है कि जिस नदी की पूजा की जाती थी, उसे माफियाओं ने मुनाफाखोरी का अड्डा बना लिया है। रेत और बजरी निकालने के चक्कर में नदी के तल को इतना गहरा और उबड़-खाबड़ कर दिया गया है कि नदी का प्राकृतिक प्रवाह (Natural Flow) पूरी तरह बाधित हो गया है। मशीनों के शोर के बीच अलकनंदा की अविरल धारा अब इतिहास बनती जा रही है।

पर्यावरणीय संकट: खत्म हो रही जैव-विविधता

नदी के भीतर हो रही अनियंत्रित खुदाई का सीधा असर जलीय जीवों और आसपास के जलस्तर पर पड़ रहा है:

  • गिरता भू-जल: अवैध खनन से आस-पास के क्षेत्रों का वाटर लेवल नीचे जा रहा है, जिससे भविष्य में पेयजल संकट गहरा सकता है।

  • जलीय जीवों पर खतरा: मछलियों और अन्य जलीय जीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो चुके हैं।

  • खेती पर मार: नदी किनारे खेती करने वाले ग्रामीणों के पास सिंचाई के लिए पानी कम होता जा रहा है।

प्रशासन का ‘मौन’ माफियाओं का ‘बल’

सबसे दुखद पहलू यह है कि यह सब खुलेआम हो रहा है, लेकिन प्रशासन और शासन ने अपनी आँखें मूंद रखी हैं। नियम केवल कागजों तक सीमित हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि रसूखदारों के दबाव में अधिकारी कार्रवाई करने से बच रहे हैं। यदि यही स्थिति रही, तो आने वाली पीढ़ियां अलकनंदा को केवल गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी के गीतों और तस्वीरों में ही देख पाएंगी।

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