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Siang Hydropower Project News: डैम के विरोध में प्रदर्शन, सरकार से पारदर्शी बातचीत की मांग

तेजपुर/ईस्ट सियांग:- अरुणाचल प्रदेश में प्रस्तावित सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट (SUMP) को लेकर स्थानीय लोगों और प्रशासन के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। 14 सितंबर को अपर सियांग और सियांग जिलों में ग्रामीणों ने परियोजना से जुड़ी प्री-फिजिबिलिटी रिपोर्ट (PFR) की गतिविधियों और प्रस्तावित ड्रिलिंग के विरोध में प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों की मुख्य चिंता जमीन, गांवों, खेती, आजीविका, पर्यावरण और आदि समुदाय की पारंपरिक जीवनशैली पर संभावित प्रभाव को लेकर है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, कोमकर और आसपास के गांवों के लोगों ने उग्गेंग में प्रस्तावित परियोजना स्थल पर PFR से जुड़ी गतिविधियों का विरोध किया। एक प्रदर्शन स्थल पर बड़ी संख्या में अर्धसैनिक बलों की तैनाती भी देखी गई।

11 हजार मेगावाट से अधिक क्षमता वाली परियोजना का विरोध

सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट को सियांग नदी पर प्रस्तावित एक बड़े बहुउद्देश्यीय हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट के तौर पर देखा जा रहा है। विभिन्न हालिया रिपोर्टों में इसकी प्रस्तावित क्षमता करीब 11,000 मेगावाट बताई गई है, जबकि कुछ रिपोर्टों में परियोजना की क्षमता 12,500 मेगावाट तक बताई गई है। इसलिए अंतिम क्षमता को परियोजना के आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर ही निश्चित माना जाना चाहिए। केंद्र और राज्य स्तर पर अरुणाचल प्रदेश की जलविद्युत क्षमता के विकास पर लंबे समय से जोर दिया जाता रहा है। वहीं, स्थानीय संगठनों का कहना है कि किसी भी बड़े प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने से पहले प्रभावित समुदायों की सहमति, पर्यावरणीय प्रभाव और पारंपरिक अधिकारों से जुड़े सवालों का समाधान जरूरी है।

27 गांवों पर असर का दावा

सियांग क्षेत्र में परियोजना का विरोध कर रहे संगठनों का कहना है कि प्रस्तावित परियोजना से करीब 27 गांव सीधे प्रभावित हो सकते हैं। सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर हिमालयन स्टडीज की मार्च 2026 की एक रिपोर्ट में भी SIFF के हवाले से 27 गांवों के सीधे प्रभावित होने की आशंका का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, इन गांवों में खेती और स्थानीय आजीविका का नदी तथा आसपास की जमीन से गहरा संबंध है। स्थानीय प्रदर्शनकारियों की ओर से प्रभावित आबादी करीब 1.5 लाख तक होने का दावा भी किया गया है। हालांकि, प्रभावित लोगों और गांवों की अंतिम संख्या आधिकारिक सर्वे, पर्यावरणीय अध्ययन और परियोजना के विस्तृत दस्तावेज सामने आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

‘मुद्दा सिर्फ मुआवजे का नहीं’

सियांग इंडिजिनस फार्मर्स फोरम और उससे जुड़े प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उनका विरोध केवल आर्थिक मुआवजे तक सीमित नहीं है। उनका तर्क है कि जमीन और संपत्ति का मौद्रिक मूल्य तय करने से गांवों, पारंपरिक आजीविका और सांस्कृतिक विरासत पर पड़ने वाले दीर्घकालिक प्रभावों की पूरी भरपाई नहीं हो सकती। प्रदर्शनकारियों के मुताबिक, सियांग नदी स्थानीय समुदाय के लिए खेती, मछली पकड़ने, जंगल से मिलने वाले संसाधनों और सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ी हुई है। इसलिए उनका कहना है कि परियोजना के प्रभाव का आकलन केवल जमीन और संपत्ति की कीमत के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए।

PFR और ड्रिलिंग गतिविधियों को लेकर विरोध

हालिया विवाद का तत्काल कारण परियोजना की प्री-फिजिबिलिटी रिपोर्ट तैयार करने से जुड़ी गतिविधियां हैं। 14 सितंबर को कोमकर और आसपास के गांवों के लोगों ने उग्गेंग में प्रस्तावित ड्रिलिंग कार्य का विरोध किया। रिपोर्टों के अनुसार, सियांग नदी के दोनों किनारों पर ग्रामीण अलग-अलग स्थानों पर एकत्र हुए थे। SIFF ने इससे पहले सुरक्षा बलों की तैनाती के बीच PFR से संबंधित गतिविधियां कराए जाने पर आपत्ति जताई थी। संगठन के प्रवक्ता ने दावा किया कि परियोजना प्रभावित परिवार सुरक्षा बलों को गांवों से हटाने और SUMP मुद्दे से जुड़े कुछ निलंबन आदेश वापस लेने की मांग कर रहे हैं। ये दावे SIFF की ओर से किए गए हैं।

सुरक्षा बलों की तैनाती पर भी विवाद

परियोजना के सर्वे और PFR गतिविधियों के लिए सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाए जाने को लेकर स्थानीय संगठनों और सरकार के बीच मतभेद सामने आए हैं। SIFF ने सुरक्षा बलों की तैनाती का विरोध करते हुए इसे परियोजना से जुड़े स्थानीय लोगों की चिंताओं के बीच तनाव बढ़ाने वाला कदम बताया है। वहीं, परियोजना से जुड़े काम को आगे बढ़ाने के लिए सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत को लेकर प्रशासनिक पक्ष की भूमिका सामने आती रही है। ऐसे में स्थानीय लोगों और प्रशासन के बीच संवाद इस विवाद का अहम हिस्सा बन गया है।

भूकंप और बांध की सुरक्षा को लेकर सवाल

प्रदर्शनकारी सियांग घाटी की भौगोलिक परिस्थितियों और भूकंपीय संवेदनशीलता को लेकर भी सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि इतने बड़े जलविद्युत प्रोजेक्ट पर आगे बढ़ने से पहले नदी के प्रवाह, भूगर्भीय परिस्थितियों, भूकंप के जोखिम और संभावित जलाशय के प्रभाव का विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है। स्थानीय संगठनों ने खास तौर पर इस बात पर जोर दिया है कि परियोजना से जुड़े सर्वे और निर्माण संबंधी फैसलों में प्रभावित गांवों की पारंपरिक भूमि व्यवस्था और सामुदायिक अधिकारों को भी शामिल किया जाए। हालिया बैठकों में ग्रामीणों ने पूर्वजों की जमीन, जंगल, नदी और पहाड़ों की सुरक्षा को लेकर अपनी चिंताएं रखी हैं।

चीन की जलविद्युत परियोजनाओं का संदर्भ

सियांग नदी का मुद्दा केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं है। क्षेत्र में प्रस्तावित भारतीय परियोजना की चर्चा अक्सर चीन की ओर से यारलुंग त्सांगपो नदी पर प्रस्तावित बड़े हाइड्रोपावर विकास के संदर्भ में भी होती है। हालांकि, स्थानीय विरोध का एक बड़ा हिस्सा जमीन, आजीविका, पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों से जुड़े सवालों पर केंद्रित है।

आदि समुदाय की पारंपरिक जीवनशैली का सवाल

सियांग घाटी में आदि समुदाय की बड़ी मौजूदगी है और नदी तथा आसपास के भू-क्षेत्र के साथ उसका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध रहा है। मार्च 2026 में प्रकाशित एक अध्ययन में भी बताया गया कि परियोजना को लेकर आदि गांवों के ग्रामीण, बुजुर्ग और छात्र संगठनों की ओर से जमीन और सांस्कृतिक निरंतरता पर संभावित प्रभाव को लेकर विरोध सामने आया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि विकास और बिजली उत्पादन की जरूरत से उन्हें आपत्ति नहीं है, लेकिन विकास की प्रक्रिया में उनकी जमीन, संस्कृति, पारंपरिक अधिकार और आजीविका की सुरक्षा सुनिश्चित होनी चाहिए।

‘बातचीत से निकले समाधान’

प्रदर्शनकारी चाहते हैं कि सरकार परियोजना से संबंधित सभी महत्वपूर्ण जानकारियां सार्वजनिक करे। इनमें पर्यावरणीय प्रभाव, सामाजिक प्रभाव, पुनर्वास, मुआवजा, प्रभावित परिवारों की संख्या और स्थानीय समुदायों के अधिकारों से जुड़ी जानकारी शामिल है। SIFF और उससे जुड़े संगठनों ने सरकार से सुरक्षा बलों की तैनाती तथा PFR गतिविधियों को लेकर भी संवाद की मांग की है। अगस्त में आयोजित एक अनौपचारिक बैठक के दौरान भी ग्रामीणों ने परियोजना के विरोध में अपनी स्थिति स्पष्ट की थी। SIFFYW के मुताबिक, बैठक में हजारों ग्रामीणों ने प्रस्तावित परियोजना का विरोध किया था। फिलहाल सियांग घाटी में परियोजना को लेकर विरोध और प्रशासनिक गतिविधियां दोनों जारी हैं। आगे की प्रक्रिया में परियोजना के तकनीकी अध्ययन के साथ स्थानीय समुदायों की आपत्तियों, पर्यावरणीय प्रभाव और पुनर्वास से जुड़े सवालों का समाधान किस तरह किया जाता है, यह महत्वपूर्ण होगा।

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