देहरादून: उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विरोध तेज हो गया है। सोमवार को देहरादून में विभिन्न सामाजिक, महिला और छात्र संगठनों से जुड़े लोगों ने गांधी पार्क से सचिवालय की ओर पैदल मार्च निकाला। प्रदर्शनकारियों ने मतदाता सूची से लाखों नाम हटाए जाने का आरोप लगाते हुए निर्वाचन आयोग से प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग की। ‘उत्तराखंड इंसानियत मंच’ और ‘उत्तराखंड महिला मंच’ की अगुवाई में आयोजित इस प्रदर्शन में कई जनसंगठनों के प्रतिनिधियों और राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों ने भाग लिया। सचिवालय के पास मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के कार्यालय की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने बैरिकेडिंग लगाकर रोक दिया। इसके बाद पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच कहासुनी और धक्का-मुक्की हुई। पुलिस ने कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेकर बसों से मौके से हटाया। प्रदर्शनकारियों के मुताबिक, इस दौरान वे मुख्य निर्वाचन अधिकारी को अपना ज्ञापन नहीं सौंप सके।
गांधी पार्क से सचिवालय तक मार्च, पुलिस से हुई धक्का-मुक्की
प्रदर्शन में छात्र नौजवान सभा, स्त्री मुक्ति लीग, जनवादी महिला संगठन, एसएफआई (SFI), एआईडीएसओ (AIDSO), इप्टा और बीजीवीएस (BGVS) सहित कई संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए। प्रदर्शनकारी हाथों में बैनर और तख्तियां लेकर गांधी पार्क से निकले थे। उनका उद्देश्य मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय तक पहुंचकर मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं के खिलाफ ज्ञापन देना था। हालांकि, सचिवालय के नजदीक पुलिस ने मार्च को आगे बढ़ने से रोक दिया। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस और धक्का-मुक्की की स्थिति बनी। प्रदर्शनकारियों के अनुसार, पुलिस ने कई लोगों को हिरासत में लिया। हिरासत में लिए गए लोगों में कमला पंत, निर्मला बिष्ट और पर्यावरणविद् डॉ. रवि चोपड़ा के नाम भी शामिल बताए गए हैं।
प्रदर्शनकारियों का आरोप- मतदाता सूची से छीना जा रहा वोट का अधिकार
आंदोलनकारियों ने आरोप लगाया कि प्री-SIR और SIR प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में नागरिकों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। उनका कहना है कि मतदाता सूची में नाम नहीं होने पर पात्र नागरिक अपने मताधिकार का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे। प्रदर्शनकारियों ने सवाल उठाया कि नाम हटाने से पहले संबंधित नागरिकों से संपर्क किया गया या नहीं और क्या उन्हें अपनी पात्रता साबित करने का उचित अवसर मिला। उनका कहना था कि किसी व्यक्ति के घर पर नहीं मिलने, स्थान बदलने या सत्यापन में परेशानी होने मात्र के आधार पर उसका नाम हटाना उचित नहीं है। ऐसे मामलों में नियमानुसार सत्यापन और शिकायत निवारण की व्यवस्था होनी चाहिए। ये आरोप प्रदर्शनकारी संगठनों की ओर से लगाए गए हैं। नाम हटाने के कारणों और प्रक्रिया की वैधता का स्वतंत्र सत्यापन अलग से किया जाना आवश्यक है।
13.95 लाख नाम हटाने का दावा, नए नाम जुड़ने के आंकड़ों पर सवाल
प्रदर्शनकारी संगठनों ने अपने प्रस्तावित ज्ञापन में दावा किया कि उत्तराखंड में प्री-SIR और SIR की प्रक्रिया के दौरान करीब 13.95 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए, जबकि लगभग 1.25 लाख नए नाम जोड़े गए। संगठनों ने वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव की मतदाता सूची से तुलना करते हुए सवाल उठाया कि मतदाताओं की संख्या में इतनी बड़ी कमी के पीछे क्या कारण रहे। उन्होंने नाम हटाने की प्रक्रिया, नागरिकों को दी गई सूचना और सत्यापन के तरीकों को लेकर विस्तृत जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की। हालांकि, ये आंकड़े प्रदर्शनकारी संगठनों के दावे हैं। नामों में बदलाव की वास्तविक वजहों और कुल प्रभाव को समझने के लिए निर्वाचन आयोग के आधिकारिक आंकड़ों तथा हटाए गए नामों के वर्गीकरण की जांच जरूरी है।
प्रदर्शनकारियों की पांच प्रमुख मांगें
आंदोलनकारी संगठनों ने अपने प्रस्तावित ज्ञापन में कई मांगें रखीं:
- SIR प्रक्रिया रद्द करने की मांग: वर्ष 2026 में चलाए गए विशेष गहन पुनरीक्षण को तत्काल रद्द किया जाए।
- पुराने मतदाताओं के नाम बहाल हों: वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव की मतदाता सूची को आधार बनाते हुए कथित तौर पर गलत तरीके से हटाए गए नामों की समीक्षा और बहाली की जाए।
- स्वतंत्र जांच हो: नाम हटाने की प्रक्रिया की स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाए तथा प्रभावित नागरिकों को सूचना और अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाए।
- शिकायत निवारण शिविर लगें: प्रत्येक जिले और विधानसभा क्षेत्र में बूथ-स्तरीय शिकायत निवारण शिविर आयोजित किए जाएं।
- मतदाता सूची का ऑडिट हो: पूरी प्रक्रिया का निष्पक्ष और स्वतंत्र ऑडिट कराकर अनियमितताओं की पहचान की जाए।
आंदोलन जारी रखने की चेतावनी
प्रदर्शनकारी संगठनों ने कहा कि पुलिस की कार्रवाई के कारण वे अपना ज्ञापन मुख्य निर्वाचन अधिकारी तक नहीं पहुंचा सके, लेकिन मताधिकार से जुड़े मुद्दे पर उनका आंदोलन जारी रहेगा। आंदोलनकारियों ने निर्वाचन आयोग और प्रशासन से मतदाता सूची में हुए बदलावों की जानकारी सार्वजनिक करने, शिकायतों का पारदर्शी निस्तारण करने और पात्र नागरिकों के मताधिकार की रक्षा सुनिश्चित करने की मांग की। उन्होंने चेतावनी दी कि मांगों पर कार्रवाई नहीं होने पर आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा।