देहरादून: उत्तराखंड वन विभाग में वरिष्ठ अधिकारियों की तैनाती को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। वरिष्ठ भारतीय वन सेवा (IFS) अधिकारी संजीव चतुर्वेदी ने राज्य सरकार के दो हालिया आदेशों पर सवाल उठाते हुए उन्हें रद्द करने की मांग की है। उन्होंने प्रमुख सचिव (वन) आर.के. सुधांशु को पत्र लिखकर आरोप लगाया है कि कुछ अधिकारियों को ऐसे कई महत्वपूर्ण पदों की जिम्मेदारी दी गई है, जिनके कार्यों के बीच हितों के टकराव (Conflict of Interest) की आशंका पैदा होती है। चतुर्वेदी का कहना है कि उनकी आपत्ति किसी व्यक्तिगत अधिकारी को लेकर नहीं, बल्कि विभाग में अपनाई गई प्रशासनिक व्यवस्था और उसके संभावित प्रभावों को लेकर है। उन्होंने अधिकारियों की जिम्मेदारियों के पृथक्करण, जवाबदेही और पारदर्शिता से जुड़े सवाल उठाए हैं। फिलहाल, इस मामले पर वन विभाग या राज्य सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
नीना ग्रेवाल की तैनाती पर सबसे बड़ी आपत्ति
संजीव चतुर्वेदी की प्रमुख आपत्ति वरिष्ठ IFS अधिकारी नीना ग्रेवाल को दी गई जिम्मेदारियों को लेकर है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ग्रेवाल को प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) का पद सौंपा गया है। वह पहले से ही मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक (Chief Wildlife Warden) और उत्तराखंड वन विकास निगम की प्रबंध निदेशक (MD) की जिम्मेदारी भी संभाल रही हैं। चतुर्वेदी ने सवाल उठाया है कि वन्यजीवों के संरक्षण और वन कानूनों के अनुपालन की जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारी के पास वन विकास निगम जैसे व्यावसायिक गतिविधियों से जुड़े संस्थान का प्रभार भी होना उचित है या नहीं। उनके तर्क के मुताबिक, वन विकास निगम की गतिविधियों में लकड़ी और वन संसाधनों से संबंधित व्यावसायिक कार्य शामिल हैं, जबकि वन्यजीव विभाग का दायित्व वन्यजीवों और उनके प्राकृतिक आवास की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। ऐसे में दोनों तरह की जिम्मेदारियां एक ही अधिकारी के पास होने से संभावित हितों के टकराव और स्वतंत्र निगरानी को लेकर सवाल खड़े हो सकते हैं।
पखरो टाइगर सफारी मामले का भी दिया हवाला
संजीव चतुर्वेदी ने अपनी आपत्तियों के संदर्भ में कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के पखरो टाइगर सफारी में कथित अवैध निर्माण और पेड़ों की कटाई से जुड़े मामले का भी उल्लेख किया है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के रुख का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में अदालती निर्देशों का सही तरीके से पालन सुनिश्चित करने के लिए निष्पक्ष निगरानी और स्वतंत्र जांच महत्वपूर्ण है। उनकी चिंता यह है कि यदि नियामक और अन्य संबंधित जिम्मेदारियां एक ही अधिकारी के पास केंद्रित हों, तो निगरानी की स्वतंत्रता और जवाबदेही प्रभावित होने की आशंका हो सकती है। हालांकि, इन आपत्तियों और उनके प्रशासनिक प्रभावों पर सरकार का पक्ष सामने आना अभी बाकी है।
खुद ही अपने काम की समीक्षा करने का सवाल
चतुर्वेदी ने अधिकारियों के वार्षिक कार्य मूल्यांकन को लेकर भी सवाल उठाया है। उनके पत्र के अनुसार, वर्ष 2021 के एक सरकारी नियम में मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (CR) लिखने की जिम्मेदारी प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) को दी गई है। चतुर्वेदी का तर्क है कि यदि दोनों पद एक ही अधिकारी के पास रहते हैं, तो अपने ही काम का मूल्यांकन किए जाने जैसी स्थिति बन सकती है। उन्होंने इस व्यवस्था को प्रशासनिक जवाबदेही और निष्पक्ष मूल्यांकन के नजरिये से स्पष्ट किए जाने की जरूरत बताई है।
एस.पी. सुबुद्धि की जिम्मेदारियों पर भी सवाल
संजीव चतुर्वेदी ने एस.पी. सुबुद्धि को दिए गए अतिरिक्त प्रभारों पर भी आपत्ति जताई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, सुबुद्धि को वन पंचायत से संबंधित जिम्मेदारी के साथ उत्तराखंड जैव विविधता बोर्ड के अध्यक्ष का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया है। चतुर्वेदी के मुताबिक, वन पंचायतें स्थानीय स्तर पर वन और जैविक संसाधनों के प्रबंधन से जुड़ी भूमिका निभाती हैं, जबकि जैव विविधता बोर्ड संबंधित कानूनों और नियमों के क्रियान्वयन से जुड़ा है। ऐसे में दोनों संस्थाओं से संबंधित जिम्मेदारियां एक ही अधिकारी के पास होने पर संभावित हितों के टकराव की स्थिति की समीक्षा जरूरी है।
बी.के. गांगटे की नियुक्ति पर भी स्थिति स्पष्ट करने की मांग
पत्र में बी.के. गांगटे को CAMPA (क्षतिपूरक वनीकरण निधि प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण) का मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनाए जाने से जुड़े मुद्दे भी उठाए गए हैं। चतुर्वेदी ने उनकी कैडर स्थिति, वेतन और विभिन्न पदों पर नियुक्ति के लिए आवश्यक अनुमति से संबंधित पहलुओं पर स्पष्टता मांगी है। इन सवालों पर संबंधित विभाग की ओर से आधिकारिक जवाब सामने आने के बाद ही प्रशासनिक स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकेगी।
सरकार के जवाब पर टिकी निगाहें
वन विभाग में अधिकारियों की तैनाती को लेकर उठे इन सवालों ने प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बंटवारे, संभावित हितों के टकराव और जवाबदेही पर चर्चा शुरू कर दी है। संजीव चतुर्वेदी ने दो सरकारी आदेशों को रद्द करने की मांग की है, जबकि राज्य सरकार और वन विभाग की ओर से इस मामले में अब तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। अब देखना होगा कि सरकार इन आपत्तियों पर क्या रुख अपनाती है और संबंधित नियुक्तियों तथा नियमों को लेकर स्थिति किस तरह स्पष्ट करती है।