13 ग्लेशियर झीलें संवेदनशील, 5 कैटेगरी-A में; उत्तराखंड में खतरे के बीच कितनी तैयारी?

उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों का बढ़ता खतरा एक बार फिर आपदा प्रबंधन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। हिमालय की ऊंची चोटियों पर तेजी से बदलते हालात के बीच ग्लेशियर पिघल रहे हैं, नई झीलें बन रही हैं और कई पुरानी ग्लेशियर झीलों के आकार में भी बदलाव देखा जा रहा है। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक, उत्तराखंड में 13 संवेदनशील ग्लेशियर झीलों को चिन्हित किया गया है। इनमें से 5 झीलों को बेहद संवेदनशील यानी कैटेगरी-A में रखा गया है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जो झीलें सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हैं, उनकी निगरानी कितनी प्रभावी तरीके से हो रही है और जो नई झीलें बन रही हैं, उनकी पहचान कब होगी?
हिमालयी क्षेत्रों में लगातार बदल रहे भौगोलिक हालात को देखते हुए यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। ग्लेशियर झीलों को इसलिए खतरनाक माना जाता है क्योंकि इनके टूटने या अचानक पानी निकलने की स्थिति में भारी मात्रा में पानी तेजी से नीचे की ओर आ सकता है। पानी के साथ बोल्डर, चट्टानें और मलबा भी बहकर नीचे आता है, जिससे रास्ते में आने वाले गांव, सड़कें, पुल और अन्य निर्माण प्रभावित हो सकते हैं। नदी किनारे बसे इलाकों के लिए भी ऐसी घटनाएं बेहद गंभीर खतरा पैदा कर सकती हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में अचानक आने वाली बाढ़ का असर बहुत कम समय में बड़े इलाके तक पहुंच सकता है। उत्तराखंड पहले भी ऐसी आपदाओं का सामना कर चुका है। केदारनाथ, रैणी और धराली जैसी घटनाओं ने यह दिखाया है कि पहाड़ों में अचानक बदलने वाली परिस्थितियां कितनी भयावह साबित हो सकती हैं।
इसके बावजूद सवाल यह है कि संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की निगरानी और संभावित खतरे से निपटने के लिए सिस्टम कितना तैयार है।
सरकार ने वर्ष 2024 में ग्लेशियर झीलों के अध्ययन के लिए विशेषज्ञों की टीम गठित की थी। इसी क्रम में वसुंधरा ताल का सर्वे किया गया था। इसके बाद जनवरी 2025 में सरकार की ओर से कहा गया था कि अन्य संवेदनशील ग्लेशियर झीलों का भी चरणबद्ध तरीके से अध्ययन कराया जाएगा। उस समय ग्लेशियर झीलों की निगरानी के लिए आधुनिक और प्रभावी मॉनिटरिंग सिस्टम विकसित करने की बात कही गई थी। इसमें झीलों की स्थिति पर लगातार नजर रखने और संभावित खतरे की समय रहते जानकारी हासिल करने पर जोर दिया गया था। लेकिन अगस्त 2026 में नेपाल में आई आपदा के बाद एक बार फिर ग्लेशियर झीलों की निगरानी को लेकर चर्चाएं तेज हुईं। इसके बाद आपदा प्रबंधन विभाग की ओर से आधुनिक सेंसर, वॉटर लेवल मॉनिटरिंग, ड्रोन और रियल टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम अपनाने की बात कही गई।
यानी जिस तकनीकी निगरानी व्यवस्था की जरूरत लंबे समय से बताई जा रही थी, उस पर अब दोबारा जोर दिया जा रहा है।
इस पूरी स्थिति ने उत्तराखंड की आपदा प्रबंधन व्यवस्था की तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। खतरा हिमालय में लगातार मौजूद है, लेकिन निगरानी, सर्वे और रियल टाइम चेतावनी व्यवस्था को लेकर अभी भी घोषणाओं और जमीनी कार्रवाई के बीच अंतर दिखाई देता है। हालांकि अब 8 सितंबर को सरस्वती ताल और केदारताल के सर्वे के लिए विशेषज्ञ दल को रवाना किया गया है। आपदा प्रबंधन विभाग के मुताबिक, विशेषज्ञ दल इन झीलों के जलस्तर और आकार में हो रहे बदलाव का अध्ययन करेगा। इसके साथ ही झीलों के आसपास के भू-भाग की स्थिति का भी आकलन किया जाएगा। विशेषज्ञ यह भी देखेंगे कि किसी संभावित घटना की स्थिति में डाउनस्ट्रीम यानी निचले इलाकों में कितना खतरा पैदा हो सकता है।
सर्वे का उद्देश्य खतरे की वास्तविक स्थिति को समझना और संभावित आपदा के प्रभाव का आकलन करना बताया जा रहा है।
लेकिन असली सवाल सर्वे के बाद की कार्रवाई को लेकर है। सिर्फ झीलों का सर्वे कर लेने से खतरा खत्म नहीं होगा। जरूरी यह है कि सर्वे में सामने आने वाली जानकारी के आधार पर संवेदनशील क्षेत्रों की मैपिंग की जाए और वहां रहने वाली आबादी के लिए ठोस सुरक्षा व्यवस्था तैयार हो। संवेदनशील इलाकों में रियल टाइम अर्ली वार्निंग सिस्टम की जरूरत भी बेहद महत्वपूर्ण है। अगर किसी ग्लेशियर झील के जलस्तर में अचानक बदलाव होता है या उसके टूटने का खतरा पैदा होता है, तो नीचे रहने वाले लोगों तक समय रहते चेतावनी पहुंचना जरूरी है।
किसी भी बड़ी आपदा की स्थिति में कुछ मिनटों की शुरुआती चेतावनी भी जान-माल के नुकसान को कम करने में अहम भूमिका निभा सकती है।
इसके लिए सिर्फ बजट जारी करना या सिस्टम बनाने की घोषणा करना पर्याप्त नहीं होगा। यह देखना भी जरूरी होगा कि सेंसर, ड्रोन, वॉटर लेवल मॉनिटरिंग और अर्ली वार्निंग सिस्टम वास्तव में जमीन पर कितने प्रभावी तरीके से काम कर रहे हैं। नेपाल में आई त्रासदी के बाद उत्तराखंड में भी ग्लेशियर झीलों को लेकर प्रशासनिक स्तर पर हलचल बढ़ी है। विशेषज्ञ दलों को सर्वे के लिए भेजा जा रहा है और आधुनिक निगरानी तकनीक अपनाने की बात सामने आ रही है। लेकिन हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता को देखते हुए सवाल अभी भी कायम है कि क्या यह तैयारी पर्याप्त है? क्या संभावित खतरे वाले इलाकों की पहचान कर वहां रहने वाली आबादी के लिए पहले से सुरक्षा योजना तैयार है?
उत्तराखंड को आपदा के बाद राहत और बचाव की तैयारी से आगे बढ़कर आपदा से पहले खतरे की पहचान और रोकथाम पर ज्यादा जोर देना होगा।
ग्लेशियर झीलों का खतरा किसी एक दिन या एक मौसम तक सीमित नहीं है। जलवायु और हिमालयी परिस्थितियों में बदलाव के साथ इन झीलों की स्थिति भी बदल सकती है। ऐसे में लगातार निगरानी और समय पर चेतावनी व्यवस्था को स्थायी सिस्टम का हिस्सा बनाना जरूरी है। अब देखना यह होगा कि सरस्वती ताल और केदारताल समेत अन्य संवेदनशील ग्लेशियर झीलों के सर्वे के बाद सरकार किस तरह की कार्रवाई करती है। क्या रिपोर्ट सिर्फ सरकारी फाइलों तक सीमित रहेगी या उसके आधार पर जमीन पर ठोस सुरक्षा व्यवस्था भी तैयार होगी? उत्तराखंड के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या आपदा प्रबंधन सिस्टम किसी बड़ी त्रासदी का इंतजार किए बिना समय रहते जागेगा, या फिर हर बार आपदा आने के बाद ही तैयारियों और व्यवस्थाओं को लेकर सक्रियता दिखाई जाएगी।




