पंजाब

पंजाब विधानसभा चुनाव 2027: मालवा की 69, माझा की 25 और दोआबा की 23 सीटों पर नजर

पंजाब चुनाव 2027 से पहले क्षेत्रवार रणनीति पर मंथन

पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों की तैयारियां धीरे-धीरे तेज हो रही हैं। 117 विधानसभा सीटों वाले राज्य में सभी दल अपने संगठन, संभावित उम्मीदवारों और क्षेत्रवार मुद्दों को लेकर रणनीति तैयार कर रहे हैं। चुनावी तैयारियों में मालवा, माझा और दोआबा के अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखा जा रहा है। पंजाब के इन तीनों क्षेत्रों में स्थानीय मुद्दों की भूमिका अलग रही है। ऐसे में राजनीतिक दल राज्यस्तरीय मुद्दों के साथ-साथ क्षेत्र विशेष से जुड़े सवालों को भी चुनावी रणनीति में शामिल कर सकते हैं।

मालवा में किसान और खेती से जुड़े मुद्दे

मालवा पंजाब का सबसे बड़ा क्षेत्र है और यहां विधानसभा की 69 सीटें हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने इस क्षेत्र की 69 में से 66 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस को दो और शिरोमणि अकाली दल को एक सीट मिली थी। मालवा में कृषि और किसानों से जुड़े सवाल लंबे समय से राजनीतिक चर्चा का हिस्सा रहे हैं। भूजल संकट, कृषि से जुड़ी चुनौतियां, बेरोजगारी और युवाओं का विदेश जाना जैसे मुद्दे भी यहां चर्चा में रहते हैं। राज्य के कई प्रमुख राजनीतिक चेहरे भी मालवा क्षेत्र से जुड़े रहे हैं। 2022 में मुख्यमंत्री भगवंत मान ने धूरी विधानसभा सीट से जीत दर्ज की थी। इसी चुनाव में प्रकाश सिंह बादल और सुखबीर सिंह बादल भी अपनी-अपनी सीटों पर आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों से चुनाव हार गए थे।

माझा में पंथक और सीमा से जुड़े मुद्दे

माझा क्षेत्र में अमृतसर, गुरदासपुर, तरनतारन और पठानकोट जिले आते हैं और यहां विधानसभा की 25 सीटें हैं। 2022 में आम आदमी पार्टी ने 16 सीटों पर जीत दर्ज की थी। कांग्रेस को सात, जबकि शिरोमणि अकाली दल और भाजपा को एक-एक सीट मिली थी। भारत-पाकिस्तान सीमा से सटे इलाकों के कारण सुरक्षा, सीमा पार तस्करी और सीमावर्ती क्षेत्रों से जुड़े मुद्दे यहां राजनीतिक चर्चा में रहते हैं। इसके अलावा नशे की समस्या, किसानों और व्यापारियों से जुड़े सवाल भी चुनावी बहस का हिस्सा बन सकते हैं। माझा के पंथक क्षेत्रों में धार्मिक और सामुदायिक मुद्दों का भी राजनीतिक प्रभाव देखा जाता रहा है। 2022 में आम आदमी पार्टी ने क्षेत्र की 15 पंथक सीटों में से 10 पर जीत दर्ज की थी, जबकि कांग्रेस ने चार और शिरोमणि अकाली दल ने एक सीट जीती थी।

दोआबा में दलित और NRI मतदाताओं पर नजर

सतलुज और ब्यास नदियों के बीच स्थित दोआबा क्षेत्र में जालंधर, होशियारपुर, कपूरथला और शहीद भगत सिंह नगर जिले आते हैं। यहां विधानसभा की 23 सीटें हैं। 2022 में आम आदमी पार्टी ने 10 और कांग्रेस ने नौ सीटें जीती थीं। भाजपा को दो, जबकि शिरोमणि अकाली दल और बहुजन समाज पार्टी को एक-एक सीट मिली थी। दोआबा को पंजाब की दलित राजनीति और प्रवासी पंजाबी समुदाय के प्रभाव वाले क्षेत्रों में गिना जाता है। ऐसे में दलित मतदाताओं से जुड़े मुद्दे, विदेश जाने की प्रक्रिया और आव्रजन से जुड़े सवाल, रोजगार तथा स्थानीय विकास यहां चुनावी चर्चा में अहम हो सकते हैं।

तीनों क्षेत्रों में अलग मुद्दों की चुनौती

पंजाब में चुनावी रणनीति केवल राज्यस्तरीय मुद्दों तक सीमित नहीं रहती। मालवा में खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े सवाल, माझा में सीमा और पंथक मुद्दे तथा दोआबा में दलित और प्रवासी पंजाबी समुदाय से जुड़े विषय अलग-अलग राजनीतिक बहस को प्रभावित कर सकते हैं। 2022 के नतीजे भी तीनों क्षेत्रों में अलग-अलग राजनीतिक तस्वीर दिखाते हैं। उस चुनाव में AAP ने राज्य की 117 में से 92 सीटें जीती थीं और तीनों क्षेत्रों में उसका प्रदर्शन मजबूत रहा था।

AAP का विकास मॉडल पर जोर

सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी की ओर से क्षेत्रीय समीकरणों के साथ सरकार के कामकाज और विकास को भी चुनावी मुद्दा बनाए जाने की बात कही जा रही है। पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री अमन अरोड़ा के अनुसार, 2022 में पार्टी के पास दिल्ली मॉडल का उदाहरण था, जबकि अब पंजाब में किए गए विकास कार्यों को सामने रखकर जनता के बीच जाने की तैयारी है। दूसरी ओर, विपक्षी दल सरकार के कामकाज, स्थानीय समस्याओं और क्षेत्रवार मुद्दों को आधार बनाकर अपनी राजनीतिक रणनीति तैयार कर रहे हैं।

2027 में क्या होगी चुनावी तस्वीर?

2027 के विधानसभा चुनाव में अभी समय है और उम्मीदवारों, गठबंधनों तथा अंतिम चुनावी मुद्दों को लेकर तस्वीर आगे और स्पष्ट होगी। फिलहाल राजनीतिक दलों के लिए मालवा की 69, माझा की 25 और दोआबा की 23 सीटें अलग-अलग सामाजिक और क्षेत्रीय मुद्दों के लिहाज से महत्वपूर्ण बनी हुई हैं। इसलिए आने वाले समय में राज्यस्तरीय मुद्दों के साथ-साथ तीनों क्षेत्रों की स्थानीय समस्याएं और मतदाताओं की प्राथमिकताएं चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती हैं।

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