पंजाब में फिर गर्माया किसान आंदोलन, 2027 चुनाव से पहले BJP-AAP की बढ़ी मुश्किलें

पंजाब में विधानसभा चुनाव से पहले किसान आंदोलन एक बार फिर सियासी गर्मी बढ़ाने लगा है। मोहाली-चंडीगढ़ सीमा पर किसान अपनी मांगों को लेकर धरने पर बैठे हैं। आंदोलन में एमएसपी की कानूनी गारंटी, किसानों की कर्ज माफी और ग्रामीण मजदूरों के लिए पेंशन जैसी मांगें प्रमुख हैं। किसान अमेरिका के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौते को रद्द करने की मांग भी उठा रहे हैं। उनका कहना है कि कृषि क्षेत्र से जुड़े फैसलों में किसानों के हितों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। आंदोलन का सबसे सीधा राजनीतिक दबाव भाजपा पर पड़ सकता है। हालांकि इस बार आम आदमी पार्टी भी इससे पूरी तरह अछूती नहीं है। कांग्रेस और अकाली दल के लिए किसानों के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने का यह एक अहम मौका बन सकता है। 2020-21 के किसान आंदोलन की राजनीतिक छाप पंजाब में भाजपा पर अभी तक दिखाई देती है। तीन कृषि कानूनों के खिलाफ चले आंदोलन के दौरान किसान संगठनों ने भाजपा के खिलाफ व्यापक अभियान चलाया था। 2022 के विधानसभा चुनाव में भी संयुक्त किसान मोर्चा की ओर से भाजपा के खिलाफ वोट की अपील की गई थी। उस चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन सीमित रहा था। इसके बाद पार्टी ने पंजाब में अपना संगठन और जनाधार बढ़ाने पर जोर दिया।
अब भाजपा 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटी है। पार्टी की ओर से राज्य की सभी 117 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की बात कही जा रही है। ऐसे में ग्रामीण पंजाब में स्वीकार्यता बढ़ाना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती है। अगर मौजूदा किसान आंदोलन के कारण केंद्र सरकार और भाजपा के खिलाफ ग्रामीण इलाकों में नाराजगी फिर मजबूत होती है तो इसका असर चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है। खासकर मालवा और दोआबा के ग्रामीण इलाकों में भाजपा उम्मीदवारों को किसानों के सवालों और विरोध का सामना करना पड़ सकता है। यह चुनौती सिर्फ किसान वोट तक सीमित नहीं है। पंजाब में खेती ग्रामीण अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार है। ऐसे में किसान संगठनों की नाराजगी का असर आढ़तियों, ग्रामीण मजदूरों और गांवों के व्यापक राजनीतिक माहौल पर भी पड़ सकता है। दूसरी ओर आम आदमी पार्टी के लिए भी इस आंदोलन को हल्के में लेना आसान नहीं होगा। 2020-21 के किसान आंदोलन के दौरान आप ने किसानों के आंदोलन का समर्थन किया था। इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 117 में से 92 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी।
अब परिस्थितियां बदल गई हैं। किसान संगठन शंभू और खनौरी मोर्चों पर मार्च 2025 में हुई पुलिस कार्रवाई और अपनी मांगें पूरी नहीं होने को लेकर पंजाब सरकार से नाराजगी जता रहे हैं। किसान नेता सरवन सिंह पंधेर ने आरोप लगाया है कि मोर्चों से गायब हुए ट्रैक्टर-ट्रॉलियों और अन्य सामान का मुआवजा पंजाब सरकार की ओर से नहीं दिया गया। सरकार और किसान संगठनों के बीच इन मुद्दों को लेकर मतभेद बने हुए हैं। किसानों की कई प्रमुख मांगें ऐसी हैं जिनका संबंध राज्य सरकार की नीतियों से भी है। इनमें एमएसपी, कर्ज मुआवजा, फसल विविधीकरण और कृषि लागत से जुड़े मुद्दे शामिल हैं। इसलिए आंदोलन बढ़ने की स्थिति में आप के विधायकों और नेताओं को ग्रामीण इलाकों में सीधे किसानों के सवालों का सामना करना पड़ सकता है। 2027 के चुनाव को देखते हुए यह स्थिति आम आदमी पार्टी के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सत्ता में रहते हुए उसे किसानों की अपेक्षाओं का जवाब देना होगा। विपक्ष में रहते हुए जो मुद्दे उठाना आसान था, अब उन्हीं मुद्दों पर सरकार को अपने फैसलों और उपलब्धियों का हिसाब देना पड़ सकता है।
कांग्रेस इस आंदोलन को केंद्र की भाजपा सरकार के साथ-साथ पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार को घेरने के लिए इस्तेमाल कर सकती है। पार्टी किसानों की मांगों के समर्थन में सड़क पर उतरती है तो उसे ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने का अवसर मिल सकता है। हालांकि कांग्रेस के सामने भी चुनौती कम नहीं है। केवल किसानों के समर्थन में बयान जारी करने से उसे फायदा मिलना तय नहीं है। पार्टी को किसानों के बीच अपनी मौजूदगी बढ़ाने और उनकी मांगों को लगातार राजनीतिक मंच पर उठाने की जरूरत होगी। अकाली दल के लिए भी मौजूदा किसान आंदोलन महत्वपूर्ण हो सकता है। कृषि कानूनों के मुद्दे पर भाजपा से गठबंधन तोड़ने के बाद अकाली दल ने किसानों के हितों को अपनी राजनीति का प्रमुख आधार बनाने की कोशिश की थी। पंजाब की ग्रामीण राजनीति में अकाली दल का पारंपरिक आधार रहा है। अगर किसान आंदोलन लंबा खिंचता है और ग्रामीण इलाकों में सरकार के खिलाफ नाराजगी बढ़ती है तो अकाली दल इसे अपनी खोई हुई जमीन वापस हासिल करने के अवसर के तौर पर देख सकता है।
राजनीतिक मामलों के विशेषज्ञ प्रोफेसर बलविंदर सिंह टिवाणा का मानना है कि किसान आंदोलन का राजनीतिक असर भाजपा और आम आदमी पार्टी दोनों पर पड़ सकता है। उनके अनुसार किसानों की कई मांगें केंद्र और राज्य सरकार, दोनों से जुड़ी हुई हैं ऐसे में मांगें पूरी नहीं होने पर दोनों सरकारों के खिलाफ नाराजगी बन सकती है। वहीं अगर कांग्रेस और अकाली दल किसानों के समर्थन में सक्रिय रूप से उतरते हैं और उनकी मांगों को मजबूती से उठाते हैं तो उन्हें ग्रामीण पंजाब में अपनी राजनीतिक पैठ दोबारा मजबूत करने का मौका मिल सकता है। पंजाब में किसान आंदोलन का असर केवल धरना स्थल तक सीमित रहने वाला मुद्दा नहीं है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह आंदोलन ग्रामीण पंजाब के राजनीतिक मूड को प्रभावित कर सकता है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि सरकार किसानों के साथ बातचीत के जरिए समाधान निकालती है या आंदोलन और लंबा खिंचता है। अगर गतिरोध जारी रहता है तो चुनावी माहौल में किसान मुद्दा भाजपा और आप के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है, जबकि कांग्रेस और अकाली दल इसे अपनी राजनीतिक वापसी के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश करेंगे।




