नाबालिग के यौन शोषण पर सख्त हुआ केरल हाईकोर्ट, आरोपी की सजा बरकरार – Bebaaq Khabar

नाबालिग के यौन शोषण पर सख्त हुआ केरल हाईकोर्ट, आरोपी की सजा बरकरार

केरल हाईकोर्ट ने नाबालिग बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े पॉक्सो कानून की व्याख्या करते हुए अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी बच्चे के निजी अंग को यौन मंशा से मुंह से छुआ या चूमा जाता है, तो ऐसी हरकत पॉक्सो एक्ट की धारा 3(d) के दायरे में आने वाले ‘पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट’ के रूप में मानी जा सकती है। जस्टिस ए. बदरुद्दीन की सिंगल बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि धारा 3(d) के तहत अपराध तय करने के लिए यह जरूरी नहीं है कि आरोपी द्वारा ओरल सेक्स किया गया हो। कोर्ट ने संबंधित प्रावधान में इस्तेमाल की गई भाषा और पीड़ित बच्चे के बयान को ध्यान में रखते हुए यह निष्कर्ष दिया। मामले में पीड़ित ने अपने बयान में आरोप लगाया था कि आरोपी ने उसके लिंग को दो बार चूमा था। हाईकोर्ट ने कहा कि बच्चे के लिंग, योनि, गुदा या मूत्रमार्ग पर आरोपी के मुंह का संपर्क, यदि यौन मंशा के साथ किया गया हो, तो धारा 3(d) के तहत अपराध स्थापित करने के लिए पर्याप्त हो सकता है। अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि इस विशेष प्रावधान के तहत ‘पेनिट्रेशन’ को केवल पारंपरिक तरीके से समझना जरूरी नहीं है। कानून में बच्चे के संबंधित अंगों के साथ मुंह के संपर्क को भी स्पष्ट रूप से अपराध की परिभाषा में शामिल किया गया है। यह मामला केरल के पथनामथिट्टा जिले से जुड़ा है। आरोपों के मुताबिक, 61 वर्षीय आरोपी ने अपनी दुकान पर 14 वर्षीय नाबालिग लड़के को बुलाया था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी ने बच्चे को शराब पिलाई और गांजे की बीड़ी भी दी। इसके बाद आरोपी पर बच्चे के कपड़े उतारने और उसके निजी अंगों के साथ यौन दुर्व्यवहार करने का आरोप लगा। अभियोजन पक्ष का कहना था कि आरोपी ने इस तरह की हरकत दो बार की। मामले में पुलिस और अभियोजन पक्ष ने आरोपी के खिलाफ पॉक्सो एक्ट की कई धाराओं के तहत कार्रवाई की। इनमें धारा 3(d) के साथ धारा 4, धारा 7 और 8, धारा 5(l) के साथ धारा 6 शामिल थीं। इसके अलावा भारतीय दंड संहिता की धारा 377 और जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 77 के तहत भी आरोप लगाए गए।

इस मामले की सुनवाई विशेष पॉक्सो अदालत में हुई थी। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को पॉक्सो एक्ट की धारा 5(l) के साथ धारा 6 और धारा 10 के तहत दोषी ठहराया था। अदालत ने उसे 20 साल की कठोर कैद की सजा सुनाई थी। इसके बाद आरोपी की ओर से हाईकोर्ट में सजा के खिलाफ चुनौती दी गई। बचाव पक्ष की दलील थी कि मामले में किसी तरह की गहरी पैठ या ओरल सेक्स नहीं हुआ था। इसलिए आरोपी की हरकत को पॉक्सो एक्ट के तहत ‘पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट’ नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट की धारा 3(d) की भाषा का उल्लेख करते हुए कहा कि बच्चे के लिंग, योनि, गुदा या मूत्रमार्ग पर मुंह लगाना, यदि यौन मंशा से किया गया है, तो यह प्रावधान लागू हो सकता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून के तहत अपराध की प्रकृति तय करते समय केवल इस बात पर निर्भर नहीं किया जा सकता कि आरोपी ने किस स्तर तक शारीरिक प्रवेश किया। संबंधित धारा में बच्चे के निजी अंगों पर मुंह के संपर्क को भी विशेष रूप से शामिल किया गया है। मामले में धारा 5(l) भी महत्वपूर्ण थी। यह प्रावधान तब लागू होता है जब कोई व्यक्ति किसी बच्चे के साथ एक से अधिक बार या बार-बार पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट करता है। ऐसी स्थिति में पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत कड़ी सजा का प्रावधान है। धारा 6 के तहत दोष सिद्ध होने पर कम से कम 20 वर्ष की सजा का प्रावधान है। परिस्थितियों के आधार पर यह सजा आजीवन कारावास तक बढ़ाई जा सकती है। हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद आरोपी की ओर से दी गई यह दलील टिक नहीं पाई कि गहरी पैठ या ओरल सेक्स नहीं होने के कारण अपराध को पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट नहीं माना जा सकता। अदालत ने मामले के तथ्यों, पीड़ित के बयान और पॉक्सो एक्ट की संबंधित धाराओं की व्याख्या को ध्यान में रखते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई 20 साल की सजा को बरकरार रखा। केरल हाईकोर्ट की यह टिप्पणी इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि पॉक्सो एक्ट के तहत बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों की प्रकृति तय करते समय कानून में दिए गए शब्दों और उनके उद्देश्य को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चे के निजी अंगों के साथ यौन मंशा से किया गया मुंह का संपर्क भी कानून की गंभीर धाराओं के तहत अपराध बन सकता है।

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