Pithoragarh News: नेपाल त्रासदी के बाद बढ़ी चिंता, दारमा घाटी में भूस्खलन का बड़ा खतरा

देहरादून:- नेपाल में आई भीषण त्रासदी के बाद हिमालयी राज्यों में भूस्खलन और अन्य भू-वैज्ञानिक खतरों को लेकर वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ गई है। हिमालयी क्षेत्रों में Landslide एक गंभीर प्राकृतिक आपदा के रूप में सामने आया है। बीते कुछ दशकों में भूस्खलनों की संख्या और उनकी तीव्रता दोनों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हुआ है। इसी खतरे को समझने के लिए वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी, देहरादून के वैज्ञानिकों ने पिथौरागढ़ जिले की दारमा घाटी में भूस्खलन के खतरे, संवेदनशीलता और इससे जुड़े सामाजिक जोखिम का विस्तृत अध्ययन किया है। अध्ययन में सामने आया है कि घाटी का करीब 9 फीसदी हिस्सा हाई से वेरी हाई लैंडस्लाइड रिस्क जोन में आता है।
दारमा घाटी की 9% जमीन बेहद संवेदनशील
वैज्ञानिकों के अध्ययन के मुताबिक दारमा घाटी के करीब 9 फीसदी क्षेत्र को हाई से वेरी हाई रिस्क श्रेणी में रखा गया है। वहीं, करीब 22 फीसदी क्षेत्र मध्यम जोखिम, 26 फीसदी कम जोखिम और 43 फीसदी क्षेत्र बहुत कम जोखिम वाले जोन में आता है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि दारमा घाटी की कुल आबादी का लगभग 58 फीसदी हिस्सा उन क्षेत्रों में रह रहा है, जिन्हें भूस्खलन के लिहाज से जोखिम वाला माना गया है। यह खतरा सिर्फ प्राकृतिक ढलानों तक सीमित नहीं है। सड़कें, बस्तियां, बांध और स्थानीय आबादी भी इसकी चपेट में आ सकती है।
Machine Learning से किया गया Landslide Risk Assessment
वाडिया इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने दारमा घाटी में भूस्खलन की संभावनाओं का आकलन करने के लिए Machine Learning, Remote Sensing, Rainfall और Seismic Intensity से जुड़े आंकड़ों का इस्तेमाल किया। इस अध्ययन का शीर्षक “Machine Learning-Based Landslide Hazard and Risk Assessment in the Darma Valley, NW Himalaya” है। यह शोध Geological Journal में प्रकाशित हुआ है। वैज्ञानिकों ने अध्ययन के आधार पर चेतावनी दी है कि क्षेत्र में बढ़ते विकास कार्य, सड़क कटिंग, पर्यटन गतिविधियां और संवेदनशील ढलानों पर निर्माण भूस्खलन के खतरे को और बढ़ा सकते हैं।
1364 वर्ग किलोमीटर में फैली है दारमा घाटी
दारमा घाटी करीब 1364 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई है। इसकी लंबाई दारमा नदी के साथ लगभग 91 किलोमीटर है। घाटी में तवाघाट, जम्कू, खेत, सोबला, दार, बालिंग, चांलकम, उर्थिंग, मंडप, नागलिंग, फिलम, दुग्तू, बौन, गोई, मर्च्छा, तिदांग और सिपु समेत कई गांव स्थित हैं।
अध्ययन में सामने आए प्रमुख भौगोलिक तथ्यों के मुताबिक:
- यहां बसे गांवों की ऊंचाई करीब 1150 मीटर से 3410 मीटर तक है।
- घाटी का भू-आकृतिक विस्तार इससे भी अधिक ऊंचाई वाले इलाकों तक फैला है।
- क्षेत्र में सालाना औसत बारिश 2000 से 2500 मिलीमीटर के बीच होती है।
- कुल वार्षिक बारिश का करीब 82 फीसदी हिस्सा जून से सितंबर के मॉनसून सीजन में होता है।
- दारमा घाटी भारत-नेपाल सीमा क्षेत्र से जुड़ी हुई है।
- यह क्षेत्र कैलाश मानसरोवर यात्रा के प्रवेश मार्ग के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।
23 साल में 295 Landslides का रिकॉर्ड
वैज्ञानिकों ने वर्ष 2001 से 2023 के बीच दारमा घाटी में हुए भूस्खलनों का भी अध्ययन किया। इसके लिए Satellite Images, Google Earth Imagery और क्षेत्रीय सर्वेक्षण का इस्तेमाल किया गया। अध्ययन के दौरान घाटी में कुल 295 भूस्खलनों का रिकॉर्ड तैयार किया गया। इन सभी भूस्खलनों से प्रभावित कुल क्षेत्रफल करीब 4.9 वर्ग किलोमीटर पाया गया, जो पूरे अध्ययन क्षेत्र का लगभग 0.36 फीसदी है। अध्ययन में दर्ज भूस्खलनों का आकार भी काफी अलग-अलग पाया गया। इनका क्षेत्रफल करीब 234 वर्ग मीटर से लेकर 3.2 लाख वर्ग मीटर तक था।
विकास के साथ बढ़ सकता है Landslide का खतरा
वैज्ञानिकों के अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि प्राकृतिक परिस्थितियों के साथ-साथ मानवीय गतिविधियां भी दारमा घाटी में भूस्खलन के जोखिम को बढ़ा सकती हैं। विशेष रूप से सड़क निर्माण के लिए पहाड़ों की कटिंग, अनियोजित निर्माण, बढ़ता पर्यटन और संवेदनशील ढलानों पर गतिविधियां भविष्य में खतरे को और गंभीर बना सकती हैं। ऐसे में संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कर विकास कार्यों की योजना बनाना और आपदा जोखिम को ध्यान में रखना जरूरी माना जा रहा है।




