पंजाब

हरियाणा सरकार को हाईकोर्ट की फटकार, कर्मचारियों पर विदेश यात्रा का पूर्ण प्रतिबंध गलत

हरियाणा के सरकारी कर्मचारियों के लिए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। अदालत ने राज्य सरकार की ओर से सरकारी कर्मचारियों की विदेश यात्रा पर सितंबर 2026 तक लगाए गए पूर्ण प्रतिबंध को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने इस प्रतिबंध को मनमाना, असंगत और जरूरत से ज्यादा कठोर करार दिया। अदालत ने साफ किया कि केवल सरकारी कर्मचारी होने के आधार पर किसी व्यक्ति को विदेश यात्रा से पूरी तरह रोकना उचित नहीं है। अदालत ने कहा कि विदेश यात्रा का अधिकार केवल प्रशासनिक सुविधा या सरकार की अनुमति तक सीमित विषय नहीं है। यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह मामला हरियाणा में नर्सिंग अधिकारी के पद पर कार्यरत शीतल रानी से जुड़ा है। उन्होंने ऑस्ट्रेलिया में आयोजित होने वाली एक व्यावसायिक परीक्षा में शामिल होने के लिए विदेश यात्रा की अनुमति मांगी थी। शीतल रानी ने 23 फरवरी 2021 को रोहतक स्थित पीजीआईएमएस में नर्सिंग अधिकारी के रूप में अपनी सेवा शुरू की थी। अपने पेशेवर अनुभव और उच्च योग्यता को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से उन्होंने ऑस्ट्रेलिया में आयोजित होने वाली परीक्षा के लिए आवेदन किया था। उन्हें संबंधित पाठ्यक्रम में शामिल होने और 29 सितंबर को होने वाली परीक्षा में उपस्थित होने की अनुमति भी मिल गई थी। इसके बाद उन्होंने 18 अगस्त को अर्जित अवकाश के लिए आवेदन किया। हालांकि, हरियाणा सरकार के 10 जून को जारी निर्देशों के आधार पर उनके अवकाश आवेदन पर विचार नहीं किया गया। सरकारी आदेश के तहत कर्मचारियों की विदेश यात्रा पर व्यापक प्रतिबंध लगाया गया था। मामला हाईकोर्ट पहुंचने के बाद राज्य सरकार ने अपने फैसले के पीछे वैश्विक परिस्थितियों को आधार बनाया। सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि रूस-यूक्रेन संघर्ष और पश्चिम एशिया में जारी संकट का वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर असर पड़ा है। सरकार ने विशेष रूप से ईंधन और अन्य आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता पर पड़ने वाले प्रभाव का हवाला दिया। राज्य सरकार के मुताबिक, संसाधनों का संरक्षण और सरकारी खर्च में कमी लाने के लिए मितव्ययता के तौर पर अस्थायी प्रतिबंध लगाया गया था।

सरकार का तर्क था कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए विदेश यात्राओं को सीमित करना प्रशासनिक और आर्थिक दृष्टि से जरूरी था। हालांकि, हाईकोर्ट ने सरकार की इस दलील को व्यापक और पूर्ण प्रतिबंध को उचित ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं माना। अदालत ने कहा कि किसी एक विशेष परिस्थिति के आधार पर सरकारी कर्मचारियों के पूरे वर्ग को विदेश यात्रा से रोकना उचित नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकारी सेवा में होना किसी कर्मचारी के मौलिक अधिकारों को समाप्त नहीं करता। प्रशासनिक जरूरतों और सार्वजनिक हित को ध्यान में रखते हुए उचित नियम बनाए जा सकते हैं, लेकिन पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के लिए ठोस और अनुपातिक आधार जरूरी है। हाईकोर्ट ने माना कि विदेश यात्रा पर पूर्ण रोक लगाना व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सीधा प्रभाव डालता है। इसलिए इस तरह के प्रतिबंध को केवल सामान्य प्रशासनिक आदेश के आधार पर लागू नहीं किया जा सकता। शीतल रानी के मामले में अदालत ने सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिया कि वह उनकी ऑस्ट्रेलिया यात्रा के संबंध में उचित आदेश पारित करे, ताकि वह अपनी व्यावसायिक परीक्षा में शामिल हो सकें। इस फैसले से हरियाणा के उन सरकारी कर्मचारियों को भी राहत मिलने की उम्मीद है, जो नौकरी से जुड़े प्रशिक्षण, उच्च शिक्षा, व्यावसायिक परीक्षाओं या अन्य उचित कारणों से विदेश यात्रा करना चाहते हैं। हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि सरकारी कर्मचारी बिना किसी अनुमति के विदेश यात्रा कर सकेंगे। विभागीय नियमों और सक्षम प्राधिकारी से आवश्यक अनुमति की प्रक्रिया लागू रहेगी। फैसले का अहम पहलू यह है कि सरकार किसी पूरे कर्मचारी वर्ग पर एक समान और पूर्ण प्रतिबंध लगाने के बजाय परिस्थितियों और व्यक्तिगत मामलों के आधार पर निर्णय ले सकती है। हाईकोर्ट की टिप्पणी ने सरकारी कर्मचारियों के प्रशासनिक नियमों और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन के सवाल को भी महत्वपूर्ण बना दिया है। अदालत ने संकेत दिया कि सरकारी नीतियां सार्वजनिक हित में हो सकती हैं, लेकिन उनका असर जरूरत से ज्यादा व्यापक नहीं होना चाहिए। शीतल रानी के मामले में अब सक्षम प्राधिकारी को हाईकोर्ट के निर्देश के अनुसार उनके आवेदन पर उचित निर्णय लेना होगा। इस फैसले को सरकारी कर्मचारियों के व्यक्तिगत स्वतंत्रता और विदेश यात्रा के अधिकार से जुड़े महत्वपूर्ण आदेश के तौर पर देखा जा रहा है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button